जाप पांच पौड़ी
पहली पौड़ी
ओउम श्री अमर दिवान ईसान करे, शोह पल विच दुःख कटेंदा |
देवे लहर निहाल करे च गैभों उछ्लों देंदा |
जादम सेवा कर दरिया दी, तुरंत मुराद पुजेंदा |
खावंद पूरा लंगर दी साईं, बहिदा वह हमेशा दूला खूटे नहीं किदांई |
तुद विच हीरे मानक मोती लाल जवाहर अंत लहिंदा नाहीं |
जादम सेवा कर दरिया डी मैं बरदा तू साईं |
जंगल दे विच पीर प्यारा जल थल बहिर आऊंदा |
घोड़ा सहित प्लान दसीवे, सब कोई दरिया कहंदा |
जादम सेवा कर दरिया दी, गीत साहिब गुण गांदा |
खावंद तू लंगर दा पूरा, देवें ते दिलवाएं हमेशा लाल रत्ता रंग गूढ़ा |
भरे भरावे, उल्ट उलटावे छोड़े नही अधूरा |
जादम सेवा कर दरिया दी साहिब नाल हजूरा |
तूं दरिया नदियां दा राजा, तहं जिहा न कोई |
आस पुजाएना पल्लू पैनाएं सिमरे लोक सभोई |
जादम सेवा कर दरिया दी खाली गया ना कोई |
तू दरिया दे विचों लख्सहंस नाले हो चलन, लख चोरासी जून उपाई आस तेरी ते पलन |
कई सहे जोगी जती तपीसर, मंग मुरादां वलन |
जादम सेवा कर दरिया दी दात पल्लु पै झलन |
जिस दे सिर ते नाम अमर दा, सो क्यों कायल थीवे, औखी वेले जित्थे अराधिया हाजर लाल दसीवे |
सेवक संदे कम स्वारन, हसीया फिर वसीवे |
थावरजे उडेरा करे सितारी, तोड़े सेवक सदा भुलीवे |
ज्यों जाने त्योंकज उडेरा, मैं तेरे कजे कज काजीवां |
निर्गुणीयां गुण पर्वत दिसे, गुणिया कायल थीवां |
फिर जीवाएं वसाएं निम्न, जग तेरे नाम सदीवां |
जे दुख भंजन नाम तुसीहा, दा कर निर्वाह असां |
कर खसमाना लाई न फुर्सत, फेरी नज़र असां |
नाम निशान तुहिदे दर ते मैं बंदी कैदर वजां |
थावर जे असी औगुण हरे, औड़क शर्म तुसां |
जिस दे अंग करे उडेरा, तिस दे बख्त सवलें |
इक घड़ी विच तख़्त बिठैनाए, जर ना होबसू पल्ले |
वेख पराईयां चंगीयां वस्तु, जिस दा जीव ना हले |
आवर थावरे दर तेहि पहुंचे, धर्म जिनां दे पल्ले |
धर्म जिन्हां दे पल्ले होवे, चिंता मूल ना लागे |
धर्म जिन्हां दे पल्ले होवे, खुरी ते खेप ना लगे |
धर्म जिन्हां दे पल्ले होवे, कई जुग आलम बगे |
आवर थावर ऐथे ओथे धर्म धरेसी, ज्यों सोने नूं कट ना लगे |
जैहदी प्रीत लगी हरी सेती, सो राम जपन हर वेले |
इक राम जपन ते बहु खुश थीवन, इक फिरन दर दर दीलें |
इक थीवेरन विंच झूझन, इक मुड़ कर फिरन वसीले |
मुडन मुनासिब थावर नाहि, जे शोह चड़या अराकी नीले |
जैं को छाप अमर दी होवे, सो क्यूँ एदर बंजे |
अमर कोलों शोह बड़ा न कोई, दुःख सभौई भन्ने |
दृढ़ प्रीत जिस सेवक दी होसी, अमर कमाई तिन्हां दा च मने |
दास गोबिन्दा जग हुआ चानना, रतन कंवल घर कंवल उपन्ना पौड़ी ||
दूसरी पौड़ी
नमस्कार गुरुदेव स्वामी, सर्व व्यापी अन्तर्यामी |
गुरु दरिया परम सुख सागर, श्री अमर लाल पूर्ण रात्नागर |
नमो नमो देवन के देवा, नमो नमो प्रभु अलख अभेवा |
नमो नमो जलपति अविनाशी, नमो नमो घट घट के वासी |
जल से उपज्यो सब संसारा, जल स्वरुप ठाकुर करतारा |
जल है सब जीवन का जीव, गुर दरिया सकल को पीव |
जल है गोपी, जल है कहाँ, जल है मात पिता भगवान |
ब्रहमा विष्णु महादेव, श्री अमर लाल की करते सेवा |
जल गंगा जल जमुना जान, अठ सठ तीर्थ जल प्रवाण |
जल उपजावे, जल पृत पाले, जल ही सबकी सार सम्भाले |
जल ही रूप रंग बन जावे, जल ही नाचे जल ही गावे |
जल ही देखे जल ही बोले, जल ही अघम अगाध अमोले |
जल की सेवा जल की पूजा, एक निरंजन अवर ना दूजा |
जल परमेश्वर जल नारायण, जल सतगुरु जल मुक्त करायण |
जल में परमेश्वर का वसा, जहाँ कहाँ पूर्ण पुर्ख विधाता |
जल का धयान जोत की सेवा, श्री अमर लाल प्रभु अलख अभेवा |
चार खानी में जगत समाया, जल आधार सब दीसे माया |
जल पूर्ण आतम दरिया, अज अविनाशी रहया समाया |
जल है सब राजन का राजा, जल है सब साजन का साजा |
जल है सब शाहन का शाह, जल दाता जल बे परवाह |
जल की कीमत कहीं न जाये, वेद पुराण रहे गुण गाय |
पानी पिता जगत का मीत, धरती माता परम पुनीत |
दिवस रैन दूई दाई दाया, सब जग खेलत धंदे लाया |
श्री अमर लाल परमेश्वर प्यारा, सकल जगत का सृजन हारा |
धर्म राय है तिस के आगे, कर्म किये का लेखा मांगे |
चित्र गुप्त तिस लेखन हार, पाप पुण्य लिख करत पुकार |
जैसे कोई कर्म कमावे, तैसे जैसे फल को पावे |
श्री अमर लाल का सेवक दास, सिमरन भजन करन दिन रात |
मुक्त निशानी जिन के हाथ, चित्र गुप्त तिस पूछत नाही, धर्म राय डर पये मन माहिं |
धर्म राज के कागज़ सिंकारे, मुक्त भये जिन सिर पर धारे |
जिन्हां अराधिया जल पति लाल, केती छुटी् तिन्हां दे नाल |
सो सेवक जिस ह्रदय बसाये, श्री अमर लाल प्रभु होत सहाय |
मुझ अनाथ पर कृपा कीजो, सिमरन भजन दया कर दींजो |
तुझ को सिमरू प्रीत लगाये, श्री अमर लाल प्रभु होत सहाये |
उठत बैठत चलत लाल जी, तुमरा ध्यान नित रहे दयाल जी |
जब सोऊ तब ह्रुदय राखू , जब जागु तब रसना भाखु |
निस दिन रहे तुम्हारा धयान, कर कृपा मोही दीजो दान |
तूं ही अमर तू ही ब्रहमा सरुप, तू ही जलपत तूं ही आत्म रूप |
तूं ही पानी तूं ही गुरु दरया, पतत उदाहरण तेरो नाम |
तूं ही राम तूं ही कृष्ण कहायो, सन्त उबारन दृष्ट खपायो |
तूं ही उडेरा कल युग माही, रक्षा कीनी भयो सहाय |
महिमा तुमरी अपरम अपार, वेद पुरान न पायो सार |
श्री अमर लाल सिमरो बनवारी, दास पुजारा शरण तुम्हारी आया पौड़ी ||
तीसरी पौड़ी
गुरु कृपा ते पौड़ी कीनी, कर डंडोत चरण में लीनी |
रैन दिनां गुरु अपना ध्यावै, हुए अचिंत परम पद पावे |
अंडज जेरज जल से होई, जल समान अवर न कोई |
ज्योति सरुप है गुरु मेरा, ताकि चरनन करूं बसेरा |
एक गुरु छोड़ ओर गुरु ध्यावे, सातो नर्क के ठोर ना पावै |
जग सारा ओह भरमत फिरे, फिर फिर आये जूनी में पड़े |
लाख चौरासी जून उपाये, तो बिन सतगुरु के मुक्ति न पाये |
गुरु मेरा देवन का देव, सेवक लागा तुमरी सेव |
गुरु का सिमरन कर मेरे भाई, अंत समय तेरा होत सहाई |
यम्दोतन से लियो छुड़ाये, सतगुरु मार्ग दिया बताये |
सतगुरु मोह पर अमुग्रह कीना, उल्टा कमाल सीधा कर लीना |
इस कमाल में उपजो ज्ञान, गुरु परमेश्वर एक समान |
इस विध के कोई ऐब ना खोल, सतगुरु मैनुं रख चरना दे कोल | पौड़ी |
पौड़ी चार
बाबा जिन्दा कर्म कारिन्दा, कर्म कारिन्दा साईं |
तुझ बाझों मेरा अवर ना कोई, मैं कैह डर कूक सुनाई |
तू लहरी बहरी दा दाता, इक मैनू वी लहर दिखाई |
कई लख सवाली डर तेरे ते, तू हार दी आस पुजाईं |
चार कोटि में नाम तुम्हारा, रोज कयामत ताई |
उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम, सेवक सब किथाई |
पावाँ पल्लू ते माँगा मुरादां, तू हार दी आस पूजाई |
निर्धनां नू तूं धन देंदा, निपुत्रा पुत्र दिवाई |
हूं मसकीन डर खड़ा सवाली, दर्शन दान मंगाही |
दर्शन तेरा दुर्लभ लालन, बिन भागां मिलदा नाहीं |
कंचन कोट बने तेरे बंगले, विच हीरे लाल जड़ाई |
लाल पगूड़ा घाडू घड़िया, हीरे लालां जवाहर जड़िया, विच झूटन लालन साँई |
लाल सरुप अनूप अमर दा, क्या मुख शोभा आख सुनायी |
जगमग जोत अमर तेरी जगे, हार दं सांझ समायी |
नानक दास कबीर जुलाहा, तिन भी दर्शन पाया |
कर जोड़ तेरो डंडवत किनी, आकर शीश निवाया |
रविदास चमार हिजल जटेटा, तिन भी दर्शन पाया |
चारे सेवक रंगन रते, जोती जोत मिलाया |
और लख फिरे ढूढेंदी, जिस सिमरया उस पाया |
बुध सिंह सेवक दास तुम्हारा, शरण तुमारी आया |
कर जोड़ तेरी डंडवत कीनी, चरनी सीस निवाया |
पौड़ी पांच
बाबा जिंदा गुरु हमारा, जां का जग में सकल पसारा |
सकल सृष्टि जल से हुई, जल बिन कारज सरे ना कोई |
देवी देवा जल को ध्यावे, अलख पुरख का ध्यान लगावे |
अलख पुरख है ज्योति सरूप, जल हरि का कोई रेख ना रूप |
कंवल रूप में वर्णन करूं, जल का ध्यान मैं ह्रदय धरूं |
जल है सकल जीवन को जीव, थिर चरनाँ का जल ही पीर |
जल हर जीत का भेद न कोई, पूरन जोत जल से होई |
जल है तीन भवन का राजा, दुःख निवार गरीब निवाजा |
सकल सृष्टि जल से होई, जल समान अवर नहीं कोई |
जिन्दे का दर्शन मामक पाया, तभी बाबा नाम धराया |
दर्शन पाए होय ब्रह्म गियानी, पूरन जोत से जोत मिलनी |
भजन करो अलख करतार, ताकि शोभा सकल संसार |
दूजा दर्श कबीरे पाया, देह संयंक्त बैकुन्ठ सिधाया |
पूर्ण जोत से खला हजूर, चौड़ी ढाले दास कबीर |
जो कोई जल के दामन लागा,ताका दुःख भरम भय भागा |
बुध सिंह आये पड़ा तो सरनी, निश्चिय रख, रख मोहे तरनी |
सतगुरु मुझ से ऐसी कीनी, विपत काल सहता तुम दीनी |
उस सहता से भय खुशहाली, पूर्ण सतगुरु मेरे वाली |
|| दोहा ||
गुरु चरनी चित लाए रहो, तो उपज्यो सुख चैन |
सतगुरु दीन दयाल है, मन बाछ्त फल दें |
पूर्ण दर्श दिखाए के, मेटे आवा गमन ||
यम से लियो छुड़ाये के राखयो अपनी सैन |
पहली पौड़ी
ओउम श्री अमर दिवान ईसान करे, शोह पल विच दुःख कटेंदा |
देवे लहर निहाल करे च गैभों उछ्लों देंदा |
जादम सेवा कर दरिया दी, तुरंत मुराद पुजेंदा |
खावंद पूरा लंगर दी साईं, बहिदा वह हमेशा दूला खूटे नहीं किदांई |
तुद विच हीरे मानक मोती लाल जवाहर अंत लहिंदा नाहीं |
जादम सेवा कर दरिया डी मैं बरदा तू साईं |
जंगल दे विच पीर प्यारा जल थल बहिर आऊंदा |
घोड़ा सहित प्लान दसीवे, सब कोई दरिया कहंदा |
जादम सेवा कर दरिया दी, गीत साहिब गुण गांदा |
खावंद तू लंगर दा पूरा, देवें ते दिलवाएं हमेशा लाल रत्ता रंग गूढ़ा |
भरे भरावे, उल्ट उलटावे छोड़े नही अधूरा |
जादम सेवा कर दरिया दी साहिब नाल हजूरा |
तूं दरिया नदियां दा राजा, तहं जिहा न कोई |
आस पुजाएना पल्लू पैनाएं सिमरे लोक सभोई |
जादम सेवा कर दरिया दी खाली गया ना कोई |
तू दरिया दे विचों लख्सहंस नाले हो चलन, लख चोरासी जून उपाई आस तेरी ते पलन |
कई सहे जोगी जती तपीसर, मंग मुरादां वलन |
जादम सेवा कर दरिया दी दात पल्लु पै झलन |
जिस दे सिर ते नाम अमर दा, सो क्यों कायल थीवे, औखी वेले जित्थे अराधिया हाजर लाल दसीवे |
सेवक संदे कम स्वारन, हसीया फिर वसीवे |
थावरजे उडेरा करे सितारी, तोड़े सेवक सदा भुलीवे |
ज्यों जाने त्योंकज उडेरा, मैं तेरे कजे कज काजीवां |
निर्गुणीयां गुण पर्वत दिसे, गुणिया कायल थीवां |
फिर जीवाएं वसाएं निम्न, जग तेरे नाम सदीवां |
जे दुख भंजन नाम तुसीहा, दा कर निर्वाह असां |
कर खसमाना लाई न फुर्सत, फेरी नज़र असां |
नाम निशान तुहिदे दर ते मैं बंदी कैदर वजां |
थावर जे असी औगुण हरे, औड़क शर्म तुसां |
जिस दे अंग करे उडेरा, तिस दे बख्त सवलें |
इक घड़ी विच तख़्त बिठैनाए, जर ना होबसू पल्ले |
वेख पराईयां चंगीयां वस्तु, जिस दा जीव ना हले |
आवर थावरे दर तेहि पहुंचे, धर्म जिनां दे पल्ले |
धर्म जिन्हां दे पल्ले होवे, चिंता मूल ना लागे |
धर्म जिन्हां दे पल्ले होवे, खुरी ते खेप ना लगे |
धर्म जिन्हां दे पल्ले होवे, कई जुग आलम बगे |
आवर थावर ऐथे ओथे धर्म धरेसी, ज्यों सोने नूं कट ना लगे |
जैहदी प्रीत लगी हरी सेती, सो राम जपन हर वेले |
इक राम जपन ते बहु खुश थीवन, इक फिरन दर दर दीलें |
इक थीवेरन विंच झूझन, इक मुड़ कर फिरन वसीले |
मुडन मुनासिब थावर नाहि, जे शोह चड़या अराकी नीले |
जैं को छाप अमर दी होवे, सो क्यूँ एदर बंजे |
अमर कोलों शोह बड़ा न कोई, दुःख सभौई भन्ने |
दृढ़ प्रीत जिस सेवक दी होसी, अमर कमाई तिन्हां दा च मने |
दास गोबिन्दा जग हुआ चानना, रतन कंवल घर कंवल उपन्ना पौड़ी ||
दूसरी पौड़ी
नमस्कार गुरुदेव स्वामी, सर्व व्यापी अन्तर्यामी |
गुरु दरिया परम सुख सागर, श्री अमर लाल पूर्ण रात्नागर |
नमो नमो देवन के देवा, नमो नमो प्रभु अलख अभेवा |
नमो नमो जलपति अविनाशी, नमो नमो घट घट के वासी |
जल से उपज्यो सब संसारा, जल स्वरुप ठाकुर करतारा |
जल है सब जीवन का जीव, गुर दरिया सकल को पीव |
जल है गोपी, जल है कहाँ, जल है मात पिता भगवान |
ब्रहमा विष्णु महादेव, श्री अमर लाल की करते सेवा |
जल गंगा जल जमुना जान, अठ सठ तीर्थ जल प्रवाण |
जल उपजावे, जल पृत पाले, जल ही सबकी सार सम्भाले |
जल ही रूप रंग बन जावे, जल ही नाचे जल ही गावे |
जल ही देखे जल ही बोले, जल ही अघम अगाध अमोले |
जल की सेवा जल की पूजा, एक निरंजन अवर ना दूजा |
जल परमेश्वर जल नारायण, जल सतगुरु जल मुक्त करायण |
जल में परमेश्वर का वसा, जहाँ कहाँ पूर्ण पुर्ख विधाता |
जल का धयान जोत की सेवा, श्री अमर लाल प्रभु अलख अभेवा |
चार खानी में जगत समाया, जल आधार सब दीसे माया |
जल पूर्ण आतम दरिया, अज अविनाशी रहया समाया |
जल है सब राजन का राजा, जल है सब साजन का साजा |
जल है सब शाहन का शाह, जल दाता जल बे परवाह |
जल की कीमत कहीं न जाये, वेद पुराण रहे गुण गाय |
पानी पिता जगत का मीत, धरती माता परम पुनीत |
दिवस रैन दूई दाई दाया, सब जग खेलत धंदे लाया |
श्री अमर लाल परमेश्वर प्यारा, सकल जगत का सृजन हारा |
धर्म राय है तिस के आगे, कर्म किये का लेखा मांगे |
चित्र गुप्त तिस लेखन हार, पाप पुण्य लिख करत पुकार |
जैसे कोई कर्म कमावे, तैसे जैसे फल को पावे |
श्री अमर लाल का सेवक दास, सिमरन भजन करन दिन रात |
मुक्त निशानी जिन के हाथ, चित्र गुप्त तिस पूछत नाही, धर्म राय डर पये मन माहिं |
धर्म राज के कागज़ सिंकारे, मुक्त भये जिन सिर पर धारे |
जिन्हां अराधिया जल पति लाल, केती छुटी् तिन्हां दे नाल |
सो सेवक जिस ह्रदय बसाये, श्री अमर लाल प्रभु होत सहाय |
मुझ अनाथ पर कृपा कीजो, सिमरन भजन दया कर दींजो |
तुझ को सिमरू प्रीत लगाये, श्री अमर लाल प्रभु होत सहाये |
उठत बैठत चलत लाल जी, तुमरा ध्यान नित रहे दयाल जी |
जब सोऊ तब ह्रुदय राखू , जब जागु तब रसना भाखु |
निस दिन रहे तुम्हारा धयान, कर कृपा मोही दीजो दान |
तूं ही अमर तू ही ब्रहमा सरुप, तू ही जलपत तूं ही आत्म रूप |
तूं ही पानी तूं ही गुरु दरया, पतत उदाहरण तेरो नाम |
तूं ही राम तूं ही कृष्ण कहायो, सन्त उबारन दृष्ट खपायो |
तूं ही उडेरा कल युग माही, रक्षा कीनी भयो सहाय |
महिमा तुमरी अपरम अपार, वेद पुरान न पायो सार |
श्री अमर लाल सिमरो बनवारी, दास पुजारा शरण तुम्हारी आया पौड़ी ||
तीसरी पौड़ी
गुरु कृपा ते पौड़ी कीनी, कर डंडोत चरण में लीनी |
रैन दिनां गुरु अपना ध्यावै, हुए अचिंत परम पद पावे |
अंडज जेरज जल से होई, जल समान अवर न कोई |
ज्योति सरुप है गुरु मेरा, ताकि चरनन करूं बसेरा |
एक गुरु छोड़ ओर गुरु ध्यावे, सातो नर्क के ठोर ना पावै |
जग सारा ओह भरमत फिरे, फिर फिर आये जूनी में पड़े |
लाख चौरासी जून उपाये, तो बिन सतगुरु के मुक्ति न पाये |
गुरु मेरा देवन का देव, सेवक लागा तुमरी सेव |
गुरु का सिमरन कर मेरे भाई, अंत समय तेरा होत सहाई |
यम्दोतन से लियो छुड़ाये, सतगुरु मार्ग दिया बताये |
सतगुरु मोह पर अमुग्रह कीना, उल्टा कमाल सीधा कर लीना |
इस कमाल में उपजो ज्ञान, गुरु परमेश्वर एक समान |
इस विध के कोई ऐब ना खोल, सतगुरु मैनुं रख चरना दे कोल | पौड़ी |
पौड़ी चार
बाबा जिन्दा कर्म कारिन्दा, कर्म कारिन्दा साईं |
तुझ बाझों मेरा अवर ना कोई, मैं कैह डर कूक सुनाई |
तू लहरी बहरी दा दाता, इक मैनू वी लहर दिखाई |
कई लख सवाली डर तेरे ते, तू हार दी आस पुजाईं |
चार कोटि में नाम तुम्हारा, रोज कयामत ताई |
उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम, सेवक सब किथाई |
पावाँ पल्लू ते माँगा मुरादां, तू हार दी आस पूजाई |
निर्धनां नू तूं धन देंदा, निपुत्रा पुत्र दिवाई |
हूं मसकीन डर खड़ा सवाली, दर्शन दान मंगाही |
दर्शन तेरा दुर्लभ लालन, बिन भागां मिलदा नाहीं |
कंचन कोट बने तेरे बंगले, विच हीरे लाल जड़ाई |
लाल पगूड़ा घाडू घड़िया, हीरे लालां जवाहर जड़िया, विच झूटन लालन साँई |
लाल सरुप अनूप अमर दा, क्या मुख शोभा आख सुनायी |
जगमग जोत अमर तेरी जगे, हार दं सांझ समायी |
नानक दास कबीर जुलाहा, तिन भी दर्शन पाया |
कर जोड़ तेरो डंडवत किनी, आकर शीश निवाया |
रविदास चमार हिजल जटेटा, तिन भी दर्शन पाया |
चारे सेवक रंगन रते, जोती जोत मिलाया |
और लख फिरे ढूढेंदी, जिस सिमरया उस पाया |
बुध सिंह सेवक दास तुम्हारा, शरण तुमारी आया |
कर जोड़ तेरी डंडवत कीनी, चरनी सीस निवाया |
पौड़ी पांच
बाबा जिंदा गुरु हमारा, जां का जग में सकल पसारा |
सकल सृष्टि जल से हुई, जल बिन कारज सरे ना कोई |
देवी देवा जल को ध्यावे, अलख पुरख का ध्यान लगावे |
अलख पुरख है ज्योति सरूप, जल हरि का कोई रेख ना रूप |
कंवल रूप में वर्णन करूं, जल का ध्यान मैं ह्रदय धरूं |
जल है सकल जीवन को जीव, थिर चरनाँ का जल ही पीर |
जल हर जीत का भेद न कोई, पूरन जोत जल से होई |
जल है तीन भवन का राजा, दुःख निवार गरीब निवाजा |
सकल सृष्टि जल से होई, जल समान अवर नहीं कोई |
जिन्दे का दर्शन मामक पाया, तभी बाबा नाम धराया |
दर्शन पाए होय ब्रह्म गियानी, पूरन जोत से जोत मिलनी |
भजन करो अलख करतार, ताकि शोभा सकल संसार |
दूजा दर्श कबीरे पाया, देह संयंक्त बैकुन्ठ सिधाया |
पूर्ण जोत से खला हजूर, चौड़ी ढाले दास कबीर |
जो कोई जल के दामन लागा,ताका दुःख भरम भय भागा |
बुध सिंह आये पड़ा तो सरनी, निश्चिय रख, रख मोहे तरनी |
सतगुरु मुझ से ऐसी कीनी, विपत काल सहता तुम दीनी |
उस सहता से भय खुशहाली, पूर्ण सतगुरु मेरे वाली |
|| दोहा ||
गुरु चरनी चित लाए रहो, तो उपज्यो सुख चैन |
सतगुरु दीन दयाल है, मन बाछ्त फल दें |
पूर्ण दर्श दिखाए के, मेटे आवा गमन ||
यम से लियो छुड़ाये के राखयो अपनी सैन |
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