प्रार्थना तथा अरदास
श्री अमर लाल जी
श्री अमर तव शरण सच्चा उडेरा, शरण दी लज्जा तैंकू |
डाढा समां लगा कलयुग दा, हरी दा नाम दे मैकूं |
तू लाल स्वरूपी सदा निहाला, निस दिन सिमरां तैंकू |
सुन्दर सेवक बिन लाल उडेरा, प्रभु होर न जाना कैकुं |
मैं विच गुनाह तकसीर उडेरा, साईं तू नाम दी लज्ज चा पाली |
बख्श गुनाह भई गुस्ताखी, साईं तू अपना विरद् च पालीं |
हाल हीला सब तैंकू मालूम, इहां आपदा सब चा टाली |
सुन्दर सेवक शरण उडेरा, सदा दृष्टि कृपा कर पालीं |
लख अपराध करे जो सेवक, बहुर करीं सतारी |
तुझ बिन और नहीं कोई दूजा, साईं मैं किस दी आस अधारी |
अपना नाम दिवाईं जिंदपीर उडेरा, साईं मैं तेरा नाम चितारी |
सुन्दर सेवा रख नाम दी लज्जा, विरद् की लाज सम्भारी |
‘पुनः शब्द दी लाली खुल रही खुल लाली’ |
गुरु कूं मिली सही कर देखां, नित्य दर्शन लाल दिखावीं |
उन बिन नही चांदना होसी, तोरे कोटि फिरे जप माली |
सुन्दर सेवक गुरु दी करुणा, सदा पूर्ण कृपा निराली |
श्री लाल उडेरा तेरी लाल कमानी, तेरा घोड़ा वी लाल दिसीवे |
वस्त्र भी लाल, लाल भी लाल, शोभा मन धरीवे |
सुन्दर लाल, लाल भी सुन्दर, लाल देखे नित जीवे |
श्री लाल उडेर तू लाल कहावीं, सुन्दर लाली लाला |
वस्त्र भी लाल लाल भी लाल, शोभा बनी विशाला |
सुन्दर नयन अलक अरु, कुण्डल सूरज झाला |
लटकल ग्रीवा ते प्रभु जी तोरे, तेरे गल मोतियन की माला |
दासन दास सदा चिर जीवो, श्री लाल उडेरा मेरा लाल करोले वाला |
इहां आस दास की आहे जो दर्शन लाल दिखावीं |
दे दर्शन नित्य चरण ही सेवूं, धिलसा दूर करावीं |
इह जो जोड़ सुदामे वाला, तीवें जोड़ चा जुड़ावीं |
सुन्दर सेवक शरण उडेरा, सब दुःख दूर करावीं |
परम भाग सेवक बड़भागी, जिन्ह लाल दा दर्शन पाया |
दर्शन पाय होये कुल तीर्थ, कोटि तीर्थ फल पाया |
जन्म जन्म भय कोई नहीं, जिन्ह ह्रदय में दर्शन पाया |
सुन्दर सतगुरु साहिब डिठा, जिन्ह लाल जने सत् गाया |
औखियां वेले आई उडेरा, सेवक कम पियाई |
भक्तां दी लाज एवें चा रखी, जिवें द्रौपदी दी लाज रखयोई |
शरण पद्यो प्रहलाद छुड़ायो, जिवें हिरण्यकश्यप बेदियोई |
सुन्दर सेवक किस डर जाऊं उडेरा, मैं तेरे दमन तले पियोई,
साईं मैं तेरे दमन तले पियोई ||
अरदास:-
जय जय जिन्दा श्री गुरुदेव बारम्बार करूं प्रणाम |
सुर नर मुनि जन पार ना पावें, सन्त जन धारें ध्यान |
जोत स्वरुप, अकाल मूर्ति, इश्वर अजूनी अंतरयामी |
विशबम्भर तू विश्व का पालक, विश्वनाथ तू विश्व का स्वामी |
श्री वरुण देव वरदायक हो तुम, विष्णु रूप होई सर्वव्यापक |
हिरणयाक्षप सहाइ पृथ्वी माता जल पर थापी |
त्रिलोकीनाथ, दीनानाथ, तू सर्व का स्वामी |
आदि पुरुष तुम वरुण देव हो भक्तन के रक्ष पाल स्वामी |
सब सन्त ब्राह्मण शरण पड़े हैं, तव चरण कमल चित्त धारी |
पलो पाए आशीर्वाद मांगे, सब सेवक सदा सुखारी |
चौ॰- साचा नाम तेरा तू शहन-शाह, श्री हाजरा हजूर तू बेपरवाह |
करूं अब अरदास, सतगुरु तुमरे पास, हमरे कारज होवन सकले रास |
ठक्कर पुगर साईं कृपा कीजे, दास जन चित्त चरणन दीजे |
दोहा-
ठक्कर पुगर जी बेनती, निज सेवक बख्शो भूल,
कर अरदास आशीर्वाद मांगू, सच्ची दरगाह विच होवे कबूल ||
जय जय विष्णु देव जलराई, जय जय शिखर सागर जलशाई |
शिखारायण जय सागर स्वामी, जन्म नसरपुर अन्तर्यामी |
जय जय दुष्ट संहारक लाल, जय जय हिन्दू करी प्रतिपाल |
जय जय धर्म रक्षक धरणीधर, जय जय रोग नाशक धनवंतर |
तेरा अंत ना पारावार, पुगर जावें बली बली हार |
जयकारा- बोले सो फल लेव- सत् सत् श्री वरुण देव |
बोले सो अक्षय- श्री अमर ‘लाल’ की जय |
बोले सो अवधूत- जय जय ज्योति स्वरुप ||
जय जय जलदेव, वरुण सुख सागर |
जगमग ज्योति जले उजियागर ||
नमः जोत प्रकाशमय चेतन जल को रूप |
अगम अगाध अपार है सहज सरूप अनूप ||
नमस्कार गुरुदेव प्रति सर्वव्यापक सोई |
जल थल माहि पूरन सकल तिस बिन और न कोई ||
विघ्न हरे मंगल करे सर्व करें कल्याण |
घर बहार रक्षा करे श्री अमर लाल भगवान ||
जय जय जय जल के देवता जय जय ज्योति स्वरुप |
श्री अमर उदेरो लाल जय श्री झूले लाल अनूप ||
कहों कहा महिमा अनन्त सतगुरु कहत कहहि |
श्री अमर लाल अस्तुति कछु कहत बखानो ताहि ||
श्री वरुण देव ज्योति स्वरुप, सकल सृष्टी आधार |
जिसको मैं वंदन करूं, जो हैं मोक्ष भोग दातार ||